शनिवार, 20 दिसंबर 2014

चिंताकारी चाय

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चिंताकारी चाय

चाय में घुली चीनी की मिठास साफ महसूस होती है. लेकिन इसमें डीडीटी जैसे जहर की कड़वाहट भी घुली हो सकती है जो महसूस नहीं होती
अतुल चौरसिया 2014-09-15 , Issue 17 Volume 6
एक चाय, हजार अफसाने. कुछ ऐसी ही स्थिति है इस देश में चाय की. शायद ही कोई हो जिसके पास सियासत से लेकर अड्डेबाजी तक तमाम चीजों का जरिया बन चुकी चाय से जुड़ी एकाध दिलचस्प कहानी न हो. अब तो देश के प्रधानमंत्री भी ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने कभी चाय बेचकर जीवन-यापन किया था. लेकिन हो सकता है कि जो चाय आप पी रहे हैं उसमें चीनी की मिठास के साथ खतरनाक जहर भी घुला हो. पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली चर्चित गैर सरकारी संस्था ग्रीनपीस द्वारा हाल में किए गए एक व्यापक सर्वेक्षण के नतीजे कुछ ऐसा ही कह रहे हैं. अगस्त के पहले पखवाड़े जारी हुई इस सर्वेक्षण रिपोर्ट की मानें तो देश की तमाम छोटी-बड़ी चाय उत्पादक कंपनियां अपने चाय बागानों में भारी मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग कर रही हैं. गौरतलब है कि कुछ साल पहले आए एक दूसरे और चर्चित सर्वेक्षण में पाया गया था कि देश की तमाम कोला कंपनियां अपने पेय में कीटनाशकों का उपयोग कर रही हैं. देश में चाय पीनेवाली आबादी का आंकड़ा कोला कंपनियों के उत्पाद इस्तेमाल करन ेवाले लोगों की संख्या से कहीं बड़ा माना जाता है. इस लिहाज से ग्रीनपीस की यह हालिया रिपोर्ट चिंताजनक है. साफ है कि देश के औद्योगिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा यह परवाह किए बगैर उत्पादन प्रक्रिया में धड़ल्ले से कीटनाशकों का उपयोग कर रहा है कि इसका सीधा दुष्प्रभाव लोगों की सेहत पर पड़ सकता है.
चाय उत्पादन में भारत दुनिया में दूसरे पायदान पर है. अगर हम निर्यात के नजरिए से देखें तो भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा चाय निर्यातक है. चाय राज्य तथा केंद्र सरकार की आय का एक बड़ा जरिया भी है. साल 2011-12 में भारत सरकार ने चाय के निर्यात से लगभग साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए कमाए. अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक भारत की चाय कंपनियां दस लाख से अधिक लोगों के रोजगार का जरिया हैं. लेकिन ग्रीनपीस की रिपोर्ट बता रही है कि चाय कंपनियों का चेहरा आंकड़ों में जितना गुलाबी दिखता है हकीकत में उतना है नहीं. इसके कुछ स्याह पहलू भी हैं.
भारत में जितनी चाय पैदा होती है उसका 80 फीसदी हिस्सा देश के भीतर ही इस्तेमाल होता है. यदि ग्रीनपीस की मानंे तो एक आंकड़ा यह भी है कि देश में उपलब्ध चाय के अधिकतर ब्रांडों में कोई न कोई कीटनाशक मौजूद है. कह सकते हैं कि जो चाय देश का राष्ट्रीय पेय होने की हैसियत रखती है वह एक बड़ी आबादी की सेहत के लिए खतरा भी बन सकती है.
ग्रीनपीस ने साल 2013 से 2014 के बीच देश के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग ब्रांडों के कुल 49 चाय नमूने इकट्ठा कर उनका परीक्षण करवाया. इस परीक्षण में देश के शीर्ष आठ चाय ब्रांड शामिल थे. गौरतलब है कि इन आठों ब्रांडों का ही देश के चाय बाजार के करीब 65 फीसदी हिस्से पर कब्जा है. इनमें सबसे ऊपर हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड और टाटा ग्लोबल बेवरिजेस लिमिटेड का नाम है जिनकी भारतीय चाय बाजार में 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है. इनके अलावा इस सर्वेक्षण में वाघ-बकरी टी, गुडरिक टी, ट्विनिंग्स, गोल्डेन टिप्स, खो-चा और गिरनार कंपनियों के उत्पाद शामिल थे.
ग्रीनपीस की जांच के नतीजे जितना चौंकाते हैं उतना ही चिंता में भी डालते हैं. 49 नमूनों में सिर्फ तीन सुरक्षित पाए गए यानी इनमें कोई भी कीटनाशक नहीं मिला. बाकी बचे 46 नमूनों में किसी न किसी प्रकार के कीटनाशक मौजूद थे. इन नमूनों में जांचकर्ताओं ने कुल 34 किस्म के कीटनाशक पाए. इस आंकड़े के हिसाब से मौजूदा समय में भारतीय बाजार में उपलब्ध लगभग 94 फीसदी चाय ब्रांडों में कोई न कोई कीटनाशक मौजूद है. 46 प्रदूषित नमूनों में से 29 ऐसे थे जिनमें एक साथ 10 से ज्यादा किस्म के कीटनाशक मौजूद थे. एक नमूना तो ऐसा भी था जिसमें कुल 20 किस्म के कीटनाशक एक साथ इस्तेमाल हुए थे.
ये आंकड़े हमें क्या बताते हैं? इनके सहारे अगर हम भारतीय चाय उत्पादक कंपनियों और सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली समझने की कोशिश करें तो कंपनियों के लिहाज से हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि वे मुनाफे की नीयत से इस तरह के हानिकारक तत्वों का इस्तेमाल करती होंगी. लेकिन सरकारी मशीनरी के स्तर पर समस्या कहीं ज्यादा बड़ी है.
नमूनों में पाए गए कुल 34 कीटनाशकों में से बड़ी संख्या ऐसे कीटनाशकों की है जिनका चाय के उत्पादन में कहीं कोई योगदान ही नहीं है. कम से कम ये कीटनाशक भारतीय कृषि से जुड़े किसी भी नियम कानून में चाय उत्पादन के लिए आवश्यक नहीं बताए गए हैं. यानी इनके इस्तेमाल के बिना भी चाय का उत्पादन हो सकता है. दुनिया के दूसरे हिस्सों में जहां सुरक्षा मानक कड़े हैं वहां चाय उत्पादक कंपनियां ऐसा कर भी रही हैं. लेकिन भारत में ऐसा नहीं है. गैर जरूरी होने के बावजूद चाय कंपनियां धड़ल्ले से इन कीटनाशकों का इस्तेमाल चाय बागानों में करती आ रही हैं. ऐसे कीटनाशकों की संख्या 23 है. सवाल खड़ा होता है कि जब इनके इस्तेमाल की अनुमति या आवश्यकता ही नहीं है तब भी इनका उपयोग ये कंपनियां क्यों कर रही हंै. ग्रीनपीस से जुड़ीं नेहा सहगल कहती हैं, ‘रेगुलेशन (नियमन) के स्तर पर बड़ी समस्या है. अवैध और प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल पर टी बोर्ड ऑफ इंडिया ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है. उनका सिर्फ इतना कहना है कि हमारी चाय भारतीय मानकों के अनुरूप है जबकि सच्चाई यह है कि हमारे अधिकतर नमूनों में प्रतिबंधित कीटनाशक मिले हैं.’
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कीट साक्षारता के जनक डॉ. सुरेंद्र दलाल के नाम से शुरू होगा राज्य स्तरीय पुरस्कार

कीट साक्षारता के जनक डॉ. सुरेंद्र दलाल के नाम से शुरू होगा राज्य स्तरीय पुरस्कार

हरियाणा किसान आयोग देगा पुरस्कार

हर वर्ष कृषि क्षेत्र में बेहतर काम करने वाले कृषि विभाग के एडीओ को दिया जाएगा पुरस्कार

डॉ. सुरेंद्र दलाल को मरणोपरांत मिलेगा यह पुरस्कार


कीट साक्षरता के अग्रदूत डॉ. सुरेंद्र दलाल का फोटो।
नरेंद्र कुंडू
जींद। खाने की थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए जींद जिले से कीट ज्ञान क्रांति के जन्मदाता डॉ. सुरेंद्र दलाल को हरियाणा किसान आयोग ने विशेष सम्मान देने का निर्णय लिया है। हरियाणा किसान आयोग द्वारा डॉ. सुरेंद्र दलाल के नाम से राज्य स्तर पर विशेष पुरस्कार शुरू किया जा रहा है। आयोग द्वारा एक नवंबर को हरियाणा दिवस पर आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में कृषि क्षेत्र में विशेष कार्य करने वाले कृषि विभाग के एडीओ को यह पुरस्कार दिया जाएगा। कृषि क्षेत्र में डॉ. सुरेंद्र दलाल के अथक योगदान को देखते हुए आयोग ने यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया है। इसकी शुरूआत खुद डॉ. सुरेंद्र दलाल से ही की जाएगी। आयोग द्वारा डॉ. दलाल को मरणोपरांत इस पुरस्कार से नवाजा जाएगा।
फसलों में अंधाधुंध प्रयोग किये जा रहे पेस्टीसाइड के कारण दूषित हो रहे खान-पान तथा वातावरण को बचाने के लिए जींद कृषि विभाग में एडीओ के पद पर कार्यरत डॉ. सुरेंद्र दलाल ने वर्ष 2008 में जींद जिले से कीट ज्ञान की क्रांति की शुरूआत की थी। डॉ. सुरेंद्र दलाल ने आस-पास के गांवों के किसानों को कीट ज्ञान का प्रशिक्षण देने के लिए निडाना गांव में किसान खेत पाठशालाओं की शुरूआत की थी। डॉ. दलाल किसानों को प्रेरित करते हुए अकसर इस बात का जिक्र किया करते थे कि किसान जागरूकता के अभाव में अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं। जबकि कीटों को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशकों की जरूरत है ही नहीं, क्योंकि फसल में मौजूद मांसाहारी कीट खुद ही कुदरती कीटनाशी का काम करते हैं। मांसाहारी कीट शाकाहारी कीटों को खाकर नियंत्रित कर लेते हैं। डॉ. दलाल ने किसानों को जागरूक करने के लिए फसल में मौजूद शाकाहारी तथा मांसाहारी कीटों की पहचान करना तथा उनके क्रियाकलापों से फसल पर पडऩे वाले प्रभाव के बारे में बारीकी से जानकारी दी। पुरुष किसानों के साथ-साथ डॉ. दलाल ने वर्ष 2010 में महिला किसान खेत पाठशाला की भी शुरूआत की और महिलाओं को भी कीट ज्ञान की तालीम दी। यह इसी का परिणाम है कि आज जींद जिले में कीटनाशकों की खपत लगभग 50 प्रतिशत कम हो चुकी है और यहां के किसान धीरे-धीरे जागरूक होकर जहरमुक्त खेती की तरफ अपने कदम बढ़ा रहे हैं। आज यहां की महिलाएं भी पुरुष किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कीट ज्ञान की इस मुहिम को आगे बढ़ा रही हैं। दुर्भाग्यवश वर्ष 2013 में एक गंभीर बीमारी के कारण डॉ. सुरेंद्र दलाल का देहांत हो गया था। इससे उनकी इस मुहिम को बड़ा झटका लगा था लेकिन उनके देहांत के बाद भी यहां के किसान उनकी इस मुहिम को बखुबी आगे बढ़ा रहे हैं। पुरुष तथा महिला किसानोंं को जागरूक कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने तथा कृषि क्षेत्र में उनके अथक योगदान को देखते हुए हरियाणा किसान आयोग डॉ. सुरेंद्र दलाल के नाम से राज्य स्तरीय पुरस्कार शुरू करने जा रहा है। आयोग द्वारा हर वर्ष एक नवंबर को हरियाणा दिवस पर राज्य स्तरीय कार्यक्रम का आयोजन कर कृषि क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कृषि विभाग के एक एडीओ को यह पुरस्कार दिया जाएगा। आयोग द्वारा पुरस्कार के तौर पर एक प्रशस्ती पत्र और 50 हजार रुपये की राशि ईनाम स्वरूप दी जाएगी। ताकि इस मुहिम को पूरे देश में फैलाने के लिए कृषि विभाग के अन्य अधिकारियों को भी प्रेरित किया जा सके। हरियाणा किसान आयोग के चेयरमैन डॉ. आरएस प्रौधा ने हाल ही में प्रकाशित हुई आयोग की मैगजीन में इस पुरस्कार की घोषणा की है। 

पंजाब की खेती में रासायनिक प्रयोगों के दुष्प्रभावो से सबक

पंजाब की खेती में रासायनिक प्रयोगों के दुष्प्रभावो से सबक

पंजाब की खेती में रासायनिक प्रयोगों के दुष्प्रभावो से सबक by Kashmiri Lal on Monday, 23 April 2012 at 20:56 · पंजाब की खेती एक बार फिर सुर्ख़ियों में हे, परन्तु गलत कारणों से. रासायनिक खेती के दुष-प्रभावों के खिलाफ मानव-अधिकार आयोग ने काफी कुछ कहा हे, अभी हाल में ही. पहले भी योजना आयोग ने तिपनी की थी की पंजाब जिस प्रकार से भू-जल का अनाप-शनाप दोहन कर रहा हे, वो देश के लिए एक गलत मॉडल हे. वहां के मुख्य मंत्री भी टिपण्णी भी मजेदार थी, की ये मॉडल इसी केंद्र सरकार की नीतियों की ही देन हे जिसे तब हरित क्रांति या ग्रीन क्रांति कही गयी थी और अब उसे एवर-ग्रीन कहने लगे हे. ध्यान रहे की हे शब्दावली यानी केवल ग्रीन नहीं एवेर्ग्रीन भी श्री स्वामी नाथन की उपज हे जिसे हरित क्रांति का जनक कहा जाता हे. खैर, प्रकृति से खिलवाड़ या उसका बेलगाम दोहन इंसान के लिए कितना भारी पड़ सकता है, पंजाब की खेती उसका एक बड़ा उदाहरण है। पंजाब ने एक समय हरित क्रांति में अग्रणी भूमिका निभाई। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी रहा है कि खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों की खपत बढ़ती गई। यही नहीं, फिर ऐसे कीटनाशक भी इस्तेमाल होने लगे जो ज्यादा घातक थे। पंजाब में यह सबसे अधिक हुआ है और इसके भयावह नुकसान हुए हैं। इन कीटनाशकों के संपर्क और फसलों में आए उनके असर से कैंसर सहित अनेक गंभीर बीमारियां पनपी हैं। हालत यह हो गई कि पंजाब के मालवा क्षेत्र से राजस्थान की ओर जाने वाली एक ट्रेन को इसलिए ‘कैंसर ट्रेन’ के नाम से जाना जाने लगा था, क्योंकि सस्ते इलाज के लिए हर रोज इस बीमारी के शिकार लगभग सौ लोग बीकानेर जाते थे। गनीमत है कि इससे संबंधित खबरों में जब यह तथ्य सामने आने लगा कि कीटनाशकों के बेलगाम इस्तेमाल के कारण ही पंजाब के मालवा क्षेत्र में यह स्थिति बनी है, तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस पर स्वत: संज्ञान लेकर राज्य सरकार को जरूरी कार्रवाई करने के निर्देश दिए। नतीजतन पंजाब सरकार ने सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहे कीटनाशकों के उपयोग, उत्पादन और आयात पर पाबंदी लगा दी है। गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों से पंजाब के बठिंडा, फरीदकोट, मोगा, मुक्तसर, फिरोजपुर, संगरूर और मानसा जिलों में बड़ी तादाद में गरीब किसान कैंसर के शिकार हो रहे हैं। सत्तर के दशक में पंजाब में जिस हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी, उसकी बहुप्रचारित कामयाबी की कीमत अब बहुत सारे लोगों को चुकानी पड़ रही है। उस दौरान ज्यादा पैदावार देने वाली फसलों की किस्में तैयार करने के लिए रासायनिक खादों और कीटनाशकों का बेलगाम इस्तेमाल होने लगा। किसानों को शायद यह अंदाजा न रहा हो कि इसका नतीजा क्या होने वाला है। लेकिन क्या सरकार और उसकी प्रयोगशालाओं में बैठे विशेषज्ञ भी इस हकीकत से अनजान थे कि ये कीटनाशक तात्कालिक रूप से भले फायदेमंद साबित हों, लेकिन आखिरकार मनुष्य की सेहत के लिए कितने खतरनाक साबित हो सकते हैं? विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र, चंडीगढ़ स्थित पीजीआई और पंजाब विश्वविद्यालय सहित खुद सरकार की ओर से कराए गए अध्ययनों में ये तथ्य उजागर हो चुके हैं कि कीटनाशकों के व्यापक इस्तेमाल के कारण कैंसर का फैलाव खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। लेकिन विचित्र है कि चेतावनी देने वाले ऐसे तमाम अध्ययनों को सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया और स्थिति नियंत्रण में होने की बात कही। देर से सही, राज्य सरकार ने इस मसले पर एक सकारात्मक फैसला किया है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। कीटनाशकों की बाबत किसानों को जागरूक करने के साथ-साथ कैंसर के इलाज को गरीबों के लिए सुलभ बनाने की दिशा में कदम उठाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। यह ध्यान रखने की बात है कि कीटनाशक या रासायनिक खाद छिड़कने के जोखिम भरे काम में लगे ज्यादातर लोग दूसरे राज्यों से आए मजदूर होते हैं और उन्हें स्वास्थ्य बीमा या सामाजिक सुरक्षा की किसी और योजना का लाभ नहीं मिल पाता है। पंजाब के अनुभव से सबक लेते हुए देश के दूसरे हिस्सों में भी कीटनाशकों के इस्तेमाल को नियंत्रितकरने और खेती के ऐसे तौर-तरीकों को बढ़ावा देने की पहल होनी चाहिए जो सेहत और पर्यावरण के अनुकूल हों.सुना हे की असम प्रदेश की सरकार ने भी जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए काफी उपक्रम शुरू किये हे. और सुना तो ये हे की मोनसेंटो कंपनी में अपने कर्मचारियों के लिए वहां की केन्टीन में भी जैविक उत्पाद ही प्रयुक्त होते हे. लेकिन थोडा दर लगता हे की मोनसेंटो और कारगिल जैसी कंपनिया भारत जैसे देश में ये जैविक कृषि के प्रयोग होने देंगे औ ये तथाकथिक प्रगतिशील कृषि वैज्ञानिक इसे चलने देंगे?

कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग

12/17/2014 12:52:10 AM
कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से पर्यावरण से लेकर जनजीवन को होने वाले नुकसानों से हम सभी परिचित हैं। पर इसके प्रयोग को लेकर जैसी सावधानी की सरकार से अपेक्षा थी वैसी कहीं देखने में नहीं आ रही है। 
परिणाम यह है कि जनस्वास्थ्य के प्रति सतर्क कई विकसित देश तो हमारे फल-सब्जियों के निर्यात पर पाबंदी लगाने जैसे कदम भी उठा रहे हैं। इसके बावजूद हमारे देश में वैसी सतर्कता और चेतना देखने को नहीं मिल रही है जैसी कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर अपेक्षित है। क्या है समस्या और कैसे हो इस का हल, इसी पर पढिए आज के स्पॉटलाइट में जानकारों की राय ...
समय रहते चेतना होगा 
( चंद्रभूषण, महानिदेशक, सीएसई) 
कीटनाशकों के प्रयोग से मनुष्य कई प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ सकता है। सबसे प्रमुख है - तीव्र विषाक्तता (एक्यूट प्वॉयजनिंग)। इसमें कीटनाशक प्रयोग करने वाला व्यक्ति ही इसकी चपेट में आ जाता है। हमारे देश में तो यह समस्या काफी देखने में आती है। कीटनाशक के प्रयोग से होने वाली दूसरी बड़ी बीमारी है कैंसर। विशेष रूप से खून और त्वचा के कैंसर इस कारण से काफी देखने में आते हंै। इसके अलावा श्वांस संबंधी बीमारियां और शरीर संरक्षा तंत्र के कमजोर होने की समस्या इसके कारण काफी देखने में आती है। कई बार यह नर्वस प्रणाली को चपेट में ले लेता है।

कीटों और सूक्ष्म जीवों को मारने में प्रयुक्त होने वाला कीटनाशक मूल रूप से यह जहर ही है। अगर कीटनाशकों का दुरूपयोग किया जा रहा है तो इसके बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह उन सभी के लिए हानिकारक होता है जो कि इसके संपर्क में आता है। किसान, कर्मी, उपभोक्ता, जानवर सभी के लिए यह नुकसानदेह हो सकता है। इसलिए, कीटनाशकों का उपयोग तभी किया जाना चाहिए जबकि उनकी जरूरत हो। भारत के कुछ क्षेत्रों जैसे पंजाब, पश्चिमी उत्तरी प्रदेश, आंध्रप्रदेश से विशेषरूप से कीटनाशकों का अधिकप्रयोग करने की खबरें आई हैं।

कीटनाशकों के उपयोग का सबसे बेहतर तरीका यह है कि उनका इस्तेमाल "इंटीग्रेटिड पेस्ट मैनेजमेंट" के अंतर्गत किया जाए। अर्थात कीटनाशकों का प्रयोग कीट नियंत्रण के अन्य उपायों के साथ एक उपाय के रूप में किया जाए। एक मात्र उपाय के रूप में नहीं किया जाए। भारत में यह देखने में आता है कि अधिकांश लोग कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशकों पर निर्भर हो गए हैं। प्राय: तब भी कीटनाशकों का छिड़काव कर दिया जाता है जबकि उनकी जरूरत ही न हो। जबकि कीटनाशकों को प्रयोग तब होना चाहिए जबकि ऎसा लगे कि फसल में कीट लगना बढ़ सकता है। इसके साथ ही गैर रासायनिक जैविक कीटनाशकों के प्रयोग को भी प्राथमिकता देने की जरूरत है।

नीम से बने कीटनाशक आज बड़ी मात्रा में बाजार में उपलब्ध हैं। कुछ फर्मोन्स आते हैं जो कीटों को अपनी तरफ खींचते हैं। इनका भी उपयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही कीटनाशक के प्रयोग के दौरान भी यह कोशिश की जानी चाहिए कि उन कीटनाशकों का प्रयोग किया जाए जो कि अधिक विषाक्त नहीं हैं। कीटनाशक के साथ समस्या यह है कि मनुष्य इसके संपर्क में कई तरीके से आ सकता है।

कीटनाशक के प्रयोग के दौरान, फल-सब्जियों, अनाज और पानी में पहुंच चुके कीटनाशक के माध्यम से तथा कई बार तो दूध के माध्यम से भी। आशय यह कि एक बार कीटनाशक के पर्यावरण में पहुंच जाने के बाद वह कई माध्यमों से मनुष्य तक पहुंच सकता है। इसलिए कीटनाशकों के दुष्प्रभाव से बचने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि इसका कम से कम उपयोग किया जाए। इसके प्रयोग में अधिक से अधिक सावधानी बरती जाए। इसमें सरकार के कृçष्ा, स्वास्थ्य और खाद्य निरीक्षण विभाग भी भूमिका निभा सकते हैं। 

जैविक खेती ही अब रास्ता

गोपी कृष्ण, वरिष्ठ पत्रकार

रासायनिक खाद और कीटनाशकों से बचाव का सिर्फ यही तरीका है कि हम जैविक खेती अपनाएं। लेकिन सच्चाई यह है कि रसायनिक खेती के लिए सरकार की ओर से तरह-तरह के प्रोत्साहन दिए जाते हैं जबकि जैविक खेती के लिए उतने प्रोत्साहन नहीं हैं। आम आदमी के स्वास्थ्य के लिहाज से हर हाल में बेहतर जैविक खेती इसी असंतुलन की वजह से रसायनिक खेती से पिछड़ी हुई है। सरकार किसानों के लिए रसायनिक खाद पर करीब 70 हजार करोड़ रूपए का अनुदान देती है। दूसरी ओर, देश में होने वाली ज्यादातर अनुसंधान रसायनिक खेती को लेकर ही होते हैं, जैविक खेती को भी अनुसंधान की आवश्यकता होती है। उसे इस तरह का सहयोग नहीं मिल रहा है।

जैविक खेती करने वाले प्रोत्साहन तो चाहते हैं लेकिन उस तरह के सीधे अनुदान के तौर पर नहीं, जिस तरह रसायनिक खेती को सीधे तौर पर दिया जाता है। उन्हें जैविक खाद की आवश्यकता होती है। इसके लिए आवश्यक उत्पाद (बायोमास) सरलता से उपलब्ध हैं। ऎसा नहीं है कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार की ओर से जैविक खाद के उत्पादन के लिए प्रोत्साहन या अनुदान ना मिलता हो, वह मिलता तो है लेकिन यह रसायनिक खेती के मुकाबले बहुत ही कम है। यदि सरकार बिगड़ते इकोलॉजिकल सिस्टम पर चिंतित है, बिगड़ रही देश की मिट्टी की गुणवत्ता, उससे पैदा होने वाली कृषि उपज से होने वाले दीर्घकालीन आर्थिक और आमजन के स्वास्थ्य को होने नुकसान को लेकर चिंतित है और इसमें सुधार करना चाहती है तो इसके लिए सोच में बदलाव करना होगा।

जैविक खेती को प्रोत्साहन मिल सके इसके लिए पांच बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं। पहली, इस खेती का प्रचार-प्रसार करके इसे प्रोत्साहित करना होगा। दूसरी, इस क्षेत्र में अनुसंधान करने होंगे। तीसरी, आवश्यक पैसा भी इस मामले में खर्च करना होगा। चौथी बात यह कि देश में छोटे किसानों की संख्या बहुत अधिक है, उन्हें समूह में सहायता की आवश्यकता होती है। इसके लिए सरकार की ओर से सहकारी समितियां बनवाकर उन्हें जैविक खाद तैयार करने के लिए सहायता देनी चाहिए। फिर, पांचवीं महत्वपूर्ण बात यह है कि संसाधनो के इस्तेमाल को लेकर समग्र सोच तैयार करनी होगी। 

मानसिकता बदलनी होगी

जैविक खाद उत्पादन का कच्चा माल बायोमास यानी गोबर व अन्य अनुपयोगी वनस्पति की देश में कोई समस्या नहीं है। लेकिन, वर्तमान में देश में बहुत बड़ी मात्रा में गोबर का सीधे तौर पर इस्तेमाल उपले या कंडे बनाकर खाना पकाने के ईंधन के तौर पर होता है। यदि इसका इस्तेमाल गोबर गैस संयंत्र लगाने में हो तो खाना पकाने के लिए गैस के साथ, खेती के लिए खाद भी मिल जाएगी। इन सबका प्रचार-प्रसार बेहद आवश्यक है, लोगों को जानकारियां दी जानी आवश्यक हैं। लोगों की मनोदशा में बदलाव लाना होगा। आमजन को रसायनिक खाद और कीटनाशकों से पैदा होने वाली कृषि के उपयोग से होने वाली बीमारियों के बारे में जागरूक करना होगा। यदि प्राकृतिक रूप से तैयार खाद का इस्तेमाल हो तो मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर ही रहेगी और यह लंबे समय तक बेहतर उत्पादकता के साथ उपज दे सकती है। 

खेत भी हो रहे खराब 

डॉ. एन.एस. राठौड़, पूर्व कुलपति, कृषि वि.वि., जोबनेर

हरित Rांति के दौरान कृषि उपज बढ़ाने के लिए खेती में रसायनों का इस्तेमाल बहुत तेजी के साथ बढ़ा जिसके दुष्परिणाम हमें अब देखने को मिल रहे हैं। आवश्यकता से अधिक नेट्रोजन का खाद में इस्तेमाल हुआ, विभिन्न रसायनों का कीटनाशकों के तौर पर इस्तेमाल हुआ, खरपतवार हटाने के लिए हर्बिसाइड का इस्तेमाल हुआ, आखिरकार ये सब मिट्टी में ही तो मिले। इससे एक तो हमारी मिट्टी की गुणवत्ता खराब हुई और दूसरी ओर कृषि उपज जिसे मानव ने इस्तेमाल किया, उसके शरीर पर कभी चर्म रोग तो कभी कैंसर के रूप में हमें बीमारियां देखने को मिल रही हैं। रसायनिक खाद जब मानव शरीर में जाती है तो श्वेत रक्त कोशिकाएं (डब्लूबीसी) की संख्या बढ़ जाती है, यही मानव शरीर में रक्त कैंसर की जनक हैं। 

यह तर्क अकसर दिया जाता है कि रसायनिक खाद के इस्तेमाल से उत्पादकता बढ़ती है जिसका असर कुल पैदावार और उसकी लागत पर भी आता है। किसान इसीलिए जैविक खेती से कृषि उपज से बचता है। यह तर्क आधारभूत तौर पर ही गलत है। यह हो सकता है कि किसी मिट्टी को नाइट्रोजन की जरूरत हो लेकिन उसे नाइट्रोजन पहुंचाने के लिए जरूरी तो नहीं कि रसायनिक खाद का ही इस्तेमाल किया जाए। जैविक खेती के संसाधनों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। जहां तक पैदावार के बढ़ने का सवाल है तो हो सकता है कि रसायनिक खेती से कुछ लाभ मिला हो लेकिन केवल इसी के सहारे पैदावार में इजाफा हुआ, ऎसा नहीं कहा जा सकता है। यह हमें नहीं भूलना चाहिए कि किसानों को अब उन्नत बीज, उन्नत कृषि औजार तो उपलब्ध हैं हीं, साथ ही उन्हें जानकारियां भी पहले से अधिक हैं। आज किसान अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित है, इसका लाभ भी उसे मिलता रहा है।

रसायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल के साथ इन बातों की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। अब स्थिति बिल्कुल बदली हुई है। खेती योग्य मिट्टी की गुणवत्ता अत्यधिक रसायनों के इस्तेमाल से घटने लगी है। अत्यधिक रसायनों के इस्तेमाल की स्थिति को ऎसे समझा जा सकता है कि वर्ष 1950 में हम 05 करोड़ टन अनाज पैदा करते थे तब केवल 540 टन फर्टीलाइजर का इस्तेमाल कर रहे थे लेकिन अब हमारे देश में अनाज की पैदावार का स्तर 26.30 करोड़ टन के स्तर पर पहुंच गया लेकिन फर्टिलाइजर का इस्तेमाल 90 हजार टन के स्तर को पार कर रहा है। अनावश्यक रसायनिक खाद के इस्तेमाल के बाद अनाज पैदावार की लागत निकालें तो हमें इसमें मानव शरीर को होने वाली बीमारियों के इलाज पर लगने वाली लागत को भी शामिल करना ही चाहिए। 

इसके अलावा केवल मानव शरीर नहीं बल्कि पशुओं को चारे के तौर पर भी रसायनिक खाद वाला चारा ही मिलता है। इसका असर उन पर भी पड़ता है और दूध पर भी। अब जरूरत इस बात की है कि देश बायो गैस और इसके अपशिष्ट के तौर पर मिलने वाली जैविक खाद के इस्तेमाल पर ध्यान दे। बायो गैस तैयार करने की प्रçRया में जो खाद मिलती है, उस पर मक्खी-मच्छरों का हमला भी नहीं होता। उसमें आवश्यकता के मुताबिक 1.5 फीसदी नाइट्रोजन और 0.75 फीसदी पी-2 ओ-5 और के-2 ओ-5 भी मिल जाता है। इससे अधिक की तो हमारी मिट्टी को आवश्यकता भी नहीं है। यह खाद गोबर के अलावा अनुपयोगी वनस्पति, खरपतवार, पत्तों आदि से तैयार की जा सकती है।
घर की छत पर ही उगाओ अपनी सब्जी
स्पॉटलाइट डेस्क
सब्जियां चाहे मंडी से खरीदें या फिर घर के सामने बेचने आए ठेले वाले से लेकिन इस बात की गारंटी के किसी के पास नहीं है कि वह रसायनिक खाद और कीटनाशकों से मुक्त या फिर नाले में उगाई गई सब्जियां नहीं खरीदी जा रही हैं। सारे संदेहों के बावजूद मन मारकर सब्जियां खरीदी जाती हैं और पकाई जाती हैं। 

यदि मन में इच्छा हो तो कुछ हद तक ऎसी सब्जियों से निजात पाई जा सकती है, घर में ही सब्जियों को उगाकर। ऎसे बहुत से लोग हैं जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, घर में महंगी सब्जियां भी ला सकते हैं। इसके बावजूद वे मकान में किचन गार्डन बना लेते हैं। जयपुर के मानसरोवर इलाके में योगेश ने करीब 150 वर्ग गज क्षेत्र वाले मकान में किचन गार्डन बना रखा है। इसके लिए उन्होंने घर के बाहर की जमीन का इस्तेमाल नहीं किया बल्कि अपने घर की छत और बालकनी का इस्तेमाल किया है। उन्होंने गमलों में और थैलों में ही मिट्टी भरकर किचन गार्डन तैयार कर किया। फिलहाल घर में ही उन्होंने मेथी, पालक, टमाटर, बैंगन, मटर, मिर्च और धनिया उगा रखा है। शहर में इस तरह कई लोगों ने घर की छत और बालकनी पर किचन गार्डन बना रखा है।

चेन्नई और कोयम्बटूर में तो सरकार किचन गार्डन किट के लिए पचास प्रतिशत अनुदान भी दे रही है। बेगलूरू, मुम्बई, दिल्ली, गुड़गांव आदि शहरों में ऎसी अनेक संस्थाएं हैं जो घरों की छतों पर किचनगार्डन के लिए अभियान चला रही हैं।
- See more at: http://www.patrika.com/article/must-stop-abuse/50890#sthash.WkrwtMFs.dpuf

रविवार, 17 मार्च 2013

JAHAR PEPSI




Pesticides are substances or mixture of substances intended for preventing, destroying, repelling or mitigating any pest. They are a class of biocide. The most common use of pesticides is as plant protection products (also known as crop protection products), which in general protect plants from damaging influences such as weeds, diseases or insects. This use of pesticides is so common that the term pesticide is often treated as synonymous withplant protection product, although it is in fact a broader term, as pesticides are also used for non-agricultural purposes.
A pesticide is generally a chemical or biological agent (such as a virusbacterium,antimicrobial or disinfectant) that through its effect deters, incapacitates, kills or otherwise discourages pests. Target pests can include insects, plant pathogens, weeds, mollusks,birdsmammalsfish, nematodes (roundworms), and microbes that destroy property, cause nuisance, spread disease or are vectors for disease. Although there are human benefits to the use of pesticides, some also have drawbacks, such as potential toxicity to humans and other animals. According to the Stockholm Convention on Persistent Organic Pollutants, 9 of the 12 most dangerous and persistent organic chemicals are pesticides. Pesticides are categorized into four main substituent chemicals: herbicides; fungicides; insecticides and bactericides.